तू अल्हड़ नदिया मैं प्यासा बादल हूं, बादल का क्या
तू है पूरी एक सदी मैं इक पल हूं, एक पल का क्या
मैं जब भी सर से उतरा तो मैंने नंगी लाश ढकी
जन्मों, जन्मों से मैं मैला आंचल हूं, आंचल का क्या
कच्चे घरों की दहलीजों पर राजकुमार नहीं आते
क्वारे नयनों से मैं बहता काजल हूं, काजल का क्या
इस एहसास से खाली नगर में पंडित, आलिम, ज्ञानी हैं
इनके बीच अकेला मैं ही पागल हूं, पागल का क्या
मैं जगव्यापी, भूख, गरीबी, लाचारी हूं अमर रहूं
अश्वत्थामा की काया में घायल हूं, घायल का क्या।
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कुछ बरसाती बादल
गांव की इक-इक शै है बेकल खत में उसने लिक्खा है
राह तके है बूढ़ा पीपल खत में उसने लिक्खा है
खेत हैं सूखे, बदरा रूठे, खलिहानों
में धूल ही धूल
भेज दो कुछ बरसाती बादल खत में उसने लिक्खा है
गूंजे न खेतों में कजली पनघट पर सन्नाटा है
कब होगी चौपाल में हलचल खत में उसने लिक्खा है
साहूकार से कर्जा लेकर बिटिया ब्याही होरी ने
कुर्क हुए हैं बैल, बिका हल खत में उसने लिक्खा है
'राज' तुम्हारे शैहर का दामन खूं से तर दिखलाई दे
गांव का है बेदाग यह आंचल खत में उसने लिक्खा है
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दो दिलों में था जो अंतर
प्रश्न करिए चाहे जितने मेरा उत्तर है वही
घाट बदले हैं नदी ने पर समंदर है वही
इक सड़क का मील, दूजा देवता मंदिर का है
वो भी पत्थर है यही और ये भी पत्थर है वही
दूरियां कम हो गई हैं, हो गए कम फासले
दो दिलों में था जो अंतर, अब भी अंतर है वही
दोस्त, तेरे-मेरे घर के एक से हालात हैं
जो उदासी तेरे घर में मेरे दर पर है वही
इक जरा से सच ने जिसको 'राज' नंगा कर दिया
झूठ वो ही तेरे अंदर, मेरे अंदर है वही
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